अगस्त 07, 2020

भाई के पाती मयारुक बहनी के नाँव

ठउर - शिक्षक नगर  
धमधा, जिला दुरुग (छ. ग.)          
                                                   तारिख-07-08-2020         

मोर मयारुक बहनी
तोला आर्शीवाद हे 

                               ले जा पाती मोर तँय, बहनी बर संदेश।
                               बढ़िया दे देबे मया, अउ हर देबे क्लेश।।

             मोर मयारुक मंझली बहनी इहाँ हमन सबो झन बढ़िया हवन, आशा करत हव उहो सब झन बढ़िया होहूँ। तोला मोर मया भर आशीर्वाद हावय, जिनगी मा सदा सुखी रहा बहनी। दमाद बाबू ला जय जोहर कहि देबे अउ भांची भांचा ला चरण छू के प्रणाम हावय। दाई बाबू डहर ले सबो झन ला मया दुलार हावय।

             मोर मयारुक बहनी तोर भेजे राखी हा तिहार के एक दिन पहली मिल गे रहिस हावय। तोर बनाय राखी ला देख के मोला बहुत खुशी होइस हावय, बढ़िया करे बहनी चाइनीज़ राखी के जगह मा अपन हाथ के सुघ्घर बनाये राखी भेजे हस। तोर बनाय राखी ला देख के संगी संगवारी मन बड़ तारीफ करत रहिस हावय, अउ कहत रहिस सबके बहनी ला अपन हाथ से बनाये राखी पहनाना चाही। तोर राखी ला पहिने के बाद मन ला सम्बल अउ तन ला शक्ति मिलिस हावय, जेन तोर हाथ के बनाय राखी मा हावय ओ चाइनीज राखी मा कहाँ। मोर मयारुक बहनी मोला बतावत बड़ दुःख लागत हावय, कोरोना काल के चलते आसो के तीजा पोरा मा तोला लिहे बर नई आवत हावँव। येदे कालिच कोटवार हा गाँव मा हाँका पारे हावय गाँव गाँव मा कोरोना अपन पैर पसारत हावय आसो कोनो भी अपन बेटी बहनी ला तीजा पोरा मा लिहके झन लाहू अउ लाहू त 14 दिन तक कोरनटाइन रइही अउ उचित कार्यवाही करे जाही। तेकर सेती लेहे बर नई आवत हवँव, मोर रद्दा झन देखबे अउ मन ला हरदास झन करबे भाई हा मोला छोड़दिस कहिके, तोर भाई सदा तोर साथ हावय। आसो के तीजा तुँहर बिना सुन्ना लगही भांची भांचा सबो झन आवव त घर भरे भरे लगय अउ तीजा पोरा के खुशी हा दुगुना हो जावय।

                  मोर काम धाम बने चलत हावय फेर कोरोना काल के चलते डर तको बने रहिथें। ऑफिस मा नानम प्रकार के लोग आवत जावत रहिथें ता। तुंहरो काम धाम बढ़िया चलत होही भांची भांचा ला येति ओती घूमे ला झन दे कर कोरोना गाँव गाँव मा पैर पसारत हावय। मँय अपन कलम ला विराम देवत हव अपन अउ अपन परिवार के बढ़िया ख्याल रखबे बहनी। पाती मिले के बाद तहुँ पाती  मा सोर संदेश भेज देबे। 


पाती पठोइया
तोर मयारुक बड़का भाई
हेमलाल साहू 
               
              

जुलाई 23, 2020

निबंध- कोरोना वाइरस

*प्रस्तावना*
               एकठन अइसन वाइरस जेला हमन अपन खुले आँखी ले देख नई पावन, नानकुन गोटी ले कई गुना छोटे हावय। एकर सम्पर्क भोजन आय जेकर कारण तेजी ले फैलत हावय। एकर वैज्ञानिक नाम कोरोना वाइरस (कोविड नाइन्टिन) हावय। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) हा एला महामारी घोषित कर दे हावय।

*कोरोना वाइरस काय हरे?*
                 कोरोना वाइरस अइसन वाइरस आय जेकर संक्रमण ले संक्रमित ला जोर के बुखार, सर्दी अउ सूखा खाँसी के संग साँस ले मा तकलीफ होथे। अइसन वाइरस पहली कभू नई देखे गे रहिस हावय। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तेज बुखार, सर्दी, सूखा खाँसी अउ साँस ले मा तकलीफ एकर लक्षण आय। ए वाइरस ला रोके बर कोनो प्रकार के टिका (वैक्सीन) नई बन पाय हावय, विश्व के सबो देश एकर ऊपर अपन टिका बनाय के प्रयोग करत हावय। कोरोना वाइरस संक्रामक रोग होय के कारण सम्पर्क आय ले एक दूसर ऊपर तेजी ले फैलत हावय। ये वाइरस सबले पहली चीन के वुहान मा पाय गे रहिस हावय, ते पाय के एकर जन्म दाता या जन्म स्थान चीन के वुहान शहर ला माने गे हावय। आज ये रोग हा सरी देश ला अपन चपेट मा ले ले हावय।

*कोरोना वाइरस के लक्षण*
              कोविड नाइन्टिन बीमारी के शुरुआती समय मा कोनो प्रकार ले लक्षण नई दिखय। 14 दिन बाद लक्षण एकर दिखथे जेकर कारण संक्रमित मनखे के  पहचान तुरन्ते नई हो पाय। कोरोना रोग मा सबले पहली तेज बुखार फेर सूखा खाँसी, सर्दी अउ साँस ले मा तकलीफ होथे। कोरोना वाइरस के रोग ज्यादा बढ़े  ले साँस ले मा ज्यादा परेशानी, निमोनिया अउ मनखे के मौत तको हो जाथे। सियान-समारत, छोटे-छोटे लइका, गर्भवती महिला अउ  अस्थमा, मधुमेह, हिरदय के बीमारी वाला मन ला ज्यादा खतरा रहिथे। अइसने लक्षण जुकाम अउ फ्लू मा तको पाय जाथे।

*कोरोनो वाइरस ले संक्रमित होगेंव त ?*
          कोरोना वाइरस के ईलाज नइहे एकर बीमारी ला कम करे बर दवाई दे जाथे। आप जब तक ठीक नई होय हव तब तक सबले दूर रहव, ककरो सम्पर्क मा झन आँव। अमेरिका, रूस, इटली, जापान जइसे विकसित देश मन हार खा गे हावय। कोरोनो बीमारी के वैक्सीन बनाय बर काम चलत हावय अउ एंटीवाइरल दवा के परीक्षण तको चलत हावय।

*कोरोनो वाइरस ले बचाव के उपाय*
            कोरोना वाइरस बीमारी महामारी के रूप ले ले  हावय अउ सरी जगत मा अपन पाँव ला पसार सब ला लिलत हावय। कोरोना वाइरस के कोनों ईलाज नइहे एकर बचाव हमर सावधानी ले ही हो सकथे। बचाव के उपाय-
1) घर के बाहिर जावत खानी सदा मास्क ला पहिन के निकलव बिना कारण के घर ले बाहिर झन जाव।
2) अपन आप ला भीड़- भाड़, सावर्जनिक जगह जइसे- हॉस्पिटल, ऑफिस, हाट, दुकान, पारा मोहल्ला के सभा ले दूर रहव।
3) खांसत अउ झिकत खानी मुँह ला तोप के ख़ाँसव झिकव अउ  सार्वजनिक जगह मा झन थुकव।
5) अपन हाथ ला बार बार साबुन पानी ले धोवव अउ एल्कोहल आधारित सेनेटाइजर के उपयोग करव।
6) सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट ( बस, ऑटो- टैक्सी, ट्रेन, रिक्शा ) के उपयोग झन करव।
7) सरकारी आदेश अउ दिशा निर्देश के पालन करव, शासन के गाइड लाइन के अनदेखी झन करव।
8) कोरोना के लक्षण अपन आप मा दिखाई देवत  हावय त शासन ला सूचित करव।
9) कोनो शहर या संक्रमित जगह ले आवत हव त 14 दिन तक अपन आप ला कोरनटाइन करव।
10) अपन मास्क ला सार्वजनिक जगह में झन फेकव ओला जला दव या कचरा पेटी में डार देवव।

*कोरोना वाइरस के दुष्प्रभाव*
           कोरोना वाइरस के गम्भीर दुष्परिणाम निकलिस हावय। आज सरी जगत के अर्थव्यवस्था चरमरा गे हावय अउ कईठिन समस्या ला उजागर कर दे हावय। आज भारत देश मा कोरोना ले लाखो करोड़ो मनखे के रोजगार ला छीन ले हावय। कोरोना के फइले ले दूसर प्रदेश मा जाके कमइया बनिहार अउ मजदूर मन बेरोजगारी अउ गरीबी मा दिन ला काटत हावय।  फैक्टी, बस, ऑफिस, छोटे बड़े दुकान लॉकडाउन मा बन्द होंगे जेकर ले आर्थिक मंदी आगे हावय अउ विकास हा एकदम से ठप होंगे हावय। विद्यालय, महाविद्यालय के बन्द होय ले पढ़ाई लिखाई तको ठप होंगे हावय। लाखो विद्यार्थी मन के भविष्य खराब होवत हावय। कोरोना महाकाल कई ठिन समस्या ला पनपात हावय जइसे- गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य समस्या, सामाजिक अउ परिवारिक जइसन समस्या।

*प्रकृति बर वरदान*
            कोरोना वाइरस के महाकाल मनखे मन बर अभिशाप बनिस त प्रकृति बर वरदान घलो बनिस हावय साबित। कोरोना के चलते सरी जगत मा लॉक डाउन रहिस। मोटर गाड़ी फैक्ट्री मन सब बन्द रहिस जेकर चलते प्रदूषण में कमी आइस। एक रिपोर्ट के हिसाब ले कई बच्छर बाद ये बच्छर प्रदूषण मा 50% गिरावट आइस हावय। आज वातारवरण पहली ले साफ अउ स्वच्छ होंगे हावय। प्रदूषित नदिया मन के पानी मन तको साफ होइस हावय।

*उपसंहार*
              जल्दी से जल्दी कोरोना के फैलत वाइरस ला रोके बर उपाय करें जावय। कोरोना के अइसने मामला बढ़त रही त हमर विकास के गति 50 बछर पछवा जही अउ अइसन दिन आही की कोरोना के महामारी समचे मनखे ला चट कर जाही। मनखे हाथ मा हाथ धरे देखते रह जाही। आज हमन कोरोना ले सीख लेवन अउ प्रकृति से छेड़ छाड़ झन करन। मनखे ले भगवान बने के चक्कर मा अति उपद्रव झन करन, सबो ला अपन समझत मानवता रखिन।
-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा

जुलाई 22, 2020

मोर नींद ले ककरो भला होगे

मोर नींद ले ककरो भला होगे

एक सच्चा संस्मरण

लेखक: हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा

जिनगी मँ कुछ घटना अइसन होथें, जेन मनखे के मन मँ हमेशा बर बस जाथें। कुछ घटना हँसाथें, कुछ सिखाथें, अउ कुछ घटना मन मँ दूसर मनखे बर दया, मया अउ सेवा के भावना जगा देथें। मोर जिनगी मँ घटे एक अइसने घटना आज घलो मोर मन मँ ताजा हे।

जब मँय पहली बार कोऑपरेटिव सोसाइटी मँ काम करत रहेंव, त हर तीन महीना मँ ऑपरेशन ट्रेनिंग बर अहमदाबाद जाना पड़य। ट्रेनिंग के दौरान मोर संग कईठन घटना घटिस, फेर एक घटना अइसन हे, जेला मँय आज घलो भुलाय नइ सके हँव।

ट्रेनिंग पूरा होय के बाद अहमदाबाद रेलवे स्टेशन ले चाम्पा रेलवे स्टेशन तक के वापसी टिकिट मोर करा रहिस। ट्रेन ले ये सफर पूरा करे मँ लगभग छब्बीस-सत्ताइस घंटा लगत रहिस। रात के बारह बजे ट्रेन मँ चढ़े के बाद दूसरइया रात के करीब दू-तीन बजे चाम्पा उतरना रहय।

रात के बारह बजे ट्रेन आइस अउ मँय ओमा चढ़ गेंव। अपन आरक्षित सीट मँ जाके बइठेंव अउ सफर के थकान के मारे सुत गेंव। आरक्षित सीट के अपन अलग सुविधा रहिथे। भीड़-भाड़ ले दूर, अपन सीट मँ आराम से बइठे अउ सुते के सुविधा मिल जथे।

सफर के थकान अइसन रहिस कि कब दूसरइया दिन हो गे, पता नइ चलिस। दिन भर आराम करत-करत फेर रात हो गे। अब मोला चाम्पा उतरना रहय, एखर सेती बीच-बीच मँ नींद खुलत रहय।

दुर्ग स्टेशन आइस, त मँय झकनाके उठेंव। खिड़की ले बाहिर देखेंव अउ दुर्ग स्टेशन आय हे जानके फेर सुत गेंव। थोरिक देर बाद फेर नींद खुलिस। खिड़की ले झाँक के देखेंव, त बिलासपुर स्टेशन मँ गाड़ी खड़े रहय। मँय सोचेंव, ‘अभी तो समय हे, थोरिक देर अउ आराम कर लेथँव।’ अउ फेर नींद के आगोश मँ समा गेंव।

लेकिन, कभू-कभू मनखे के एकठन छोटी-सी लापरवाही घलो ओकर बर बड़ी परेशानी खड़ा कर देथे।

अचानक मोर नींद खुलिस। मँय हड़बड़ाके उठेंव अउ खिड़की ले बाहिर देखे के कोसिस करेंव। रात के अँधियारी मँ कुछ साफ नइ दिखत रहय। मँय तुरते मोबाइल निकालेंव अउ अपन लोकेशन चेक करेंव।

लोकेशन देखत भर मोर होश उड़ गे!

रायगढ़ आवे वाला रहय!

मोर हाथ-पाँव फूल गे। चाम्पा तो कब के छूट गे होही! अब का करँव? ए सोचत-सोचत मोर सबो नींद उड़ गे। मँय हड़बड़ावत अपन समान मन ला समेटेंव अउ ट्रेन के दरवाजा तीर जाके खड़े हो गेंव।

थोरिकेच देर मँ रायगढ़ स्टेशन आइस अउ मँय तुरते उतर गेंव।

अभी चैन के साँस घलो नइ ले पाय रहेंव कि टीटीआई बाबू आके टिकिट देखाय बर कहिस। मँय टिकिट दिखाएँव, त वो कहिस, “टिकिट तो चाम्पा तक के हे। अब रायगढ़ उतर गे हस, त चालान भरना पड़ही।”

मँय अपन गलती बतावत कहेंव, “साहब, का बतावँव! सफर के थकान मँ मोर नींद लग गे रहिस। चाम्पा कब आइस, पता नइ चलिस। जब नींद खुलिस, त रायगढ़ आ गे रहेंव।”

टीटीआई बाबू कहिस, “चल, वापसी के टिकिट ले लेबे, त छोड़ देहूँ।”

मँय तुरते वापसी के टिकिट लेंव। तब जाके मोला राहत मिलिस।

रात के करीब चार बजत रहिस। अपन समान मन ला धरके प्लेटफॉर्म नंबर दू मँ आके बइठ गेंव। रात के सन्नाटा, ठंडी हवा अउ लमहर सफर के थकान—सब मिलके मोला फेर आराम करे बर मजबूर कर दिस। मँय प्लेटफॉर्म मँ लेट गेंव अउ आँख मूँदके आराम करे लगेंव।

तभे एकठन अजीब घटना घटिस।

एकठन सुघ्घर, गोरी टूरी आके मोर करा बइठ गे।

एतका रात मँ प्लेटफॉर्म लगभग सुनसान रहय। ओला अचानक अपन करा बइठे देखके मँय चौंक गेंव। मोर मन मँ तरह-तरह के विचार आवे लगिन। मँय सोचेंव, ‘एतका रात मँ ये टूरी इहाँ कइसे आ गे? कहीं कोनो मुसीबत मँ तो नइ फँस जावँव? कहीं कोनो अनहोनी तो नइ होय वाला?’

डर अउ शंका के मारे मँय उठेंव अउ मुँह धोये बर चल देंव।

मुँह धोके जब वापस आके बइठेंव, त देखेंव कि वो टूरी रोवत रहय। ओकर आँख मँ आँसू रहिन अउ चेहरा मँ डर साफ झलकत रहय।

मोला देखके वो धीरे-धीरे कहे लगिस—

“भैया, मँय ओ मेर बइठे रहेंव। तभे तीन झन टूरा मन आके मोला परेशान करे लगिन। मोला इहाँ ले चले बर कहत रहिन। मँय बहुत डर गे रहेंव। आप मोला भला मनखे लगेव, एखरे सेती आप मन के करा आके बइठ गेंव।”

ओकर बात सुनके मोर मन पसीज गे। जेन टूरी ला मँय कुछ देर पहिली शंका के नजर ले देखत रहेंव, ओही टूरी के आँख मँ अब मोला अपन बहिनी के दुख दिखे लगिस।

मँय ओला ढाढ़स बँधावत कहेंव, “डर मत बहिनी, कुछ नइ होही। मँय हँव न।”

तभे वो तीनों टूरा मन फेर हमन डहर आवत दिखिन। मोला देखके वो मन आगू डहर भाग गिन।

अब मोर मन मँ एके सवाल रहिस—आखिर ये बहिनी एतका रात मँ इहाँ कइसे पहुँच गे?

मँय ओला पूछेंव, “बहिनी, तोर घर कहाँ हे? अउ तँय एतका रात मँ इहाँ कइसे आ गे?”

तब वो अपन आपबीती सुनाइस।

वो रायपुर मँ हॉस्टल मँ रहिके नर्सिंग कॉलेज मँ पढ़त रहय। छुट्टी होय के सेती अपन घर आवत रहय। गलती से लोकल ट्रेन के बदला सुपरफास्ट ट्रेन मँ बइठ गे रहय। वो ट्रेन शक्ति स्टेशन मँ नइ रुकिस, एखरे सेती वो रायगढ़ पहुँच गे रहय।

ओकर बाबूजी ओला लेगे बर शक्ति स्टेशन मँ आय रहिन होहीं। जब बेटी उहाँ नइ उतरिस, त घर के मन कतका परेशान होवत होहीं, ये सोचके वो अउ घलो रोये लगिस।

ओकर मोबाइल घलो बंद हो गे रहय। न घर मँ खबर दे सके, न कोनो परिचित ले संपर्क कर सके। अनजान शहर, आधा रात अउ ऊपर ले कुछ मनखे मन के परेशान करे के डर—ओकर हालत सचमुच दयनीय रहय।

मँय तुरते अपन मोबाइल ओला देके कहेंव, “ले बहिनी, अपन घर मँ फोन करके बता दे कि तँय सुरक्षित हस।”

वो मोर मोबाइल ले अपन घर मँ फोन करिस अउ अपन हाल-चाल बताइस। घर के मन ला ओकर सुरक्षित होय के खबर मिलिस, त ओकर चेहरा मँ राहत के मुस्कान लौट आइस।

ओ मुस्कान देखके मोर मन घलो जुड़ा गे। थोरिक देर पहिली जेन टूरी डर अउ चिंता मँ डूबी रहय, अब वो कुछ निश्चिंत दिखत रहय।

थोरिकेच देर बाद हमर ट्रेन घलो आ गे। हमन दूनों झन ट्रेन मँ चढ़ गेन। सफर के दौरान चायवाला आइस, त हमन चाय पियेन अउ थोरिक देर बातचीत करेन। अब वो टूरी के चेहरा मँ पहिली जइसन डर नइ रहय।

जब ट्रेन शक्ति स्टेशन मँ पहुँचिस, त वो उतरते बखत मोर डहर देखिस। ओकर आँख मँ आभार झलकत रहय। वो हाथ जोड़के कहिस—

“भैया, आज आप मोर बहुत मदद करे हव। मँय ए उपकार ला जिनगी भर नइ भुलाहूँ।”

ओकर बात सुनके मोर मन खुशी ले भर गे। मँय कुछ खास तो करे नइ रहेंव। बस एक परेशान बहिनी ला अपन मोबाइल देके घर मँ बात करे के मौका दे रहेंव अउ मुसीबत के बखत ओकर संग खड़े रहेंव। फेर ओकर बर ए छोटी-सी मदद घलो बड़े सहारा बन गे रहय।

ट्रेन आगू बढ़ गे, फेर वो घटना मोर मन मँ हमेशा बर छप गे।

मँय मन ही मन भगवान ला धन्यवाद देत सोचेंव—

“हे भगवान! मँय तो अपन नींद मँ चाम्पा स्टेशन छोड़के रायगढ़ उतर गे रहेंव, फेर मोर ए गलती के कारण एक जरूरतमंद बहिनी के मदद हो गे। सचमुच, मोर नींद ले ककरो भला हो गे!”

आज जब मँय ओ घटना ला याद करथँव, त मोला लगथे कि जिनगी के हर घटना खाली संयोग नइ होवय। कभू-कभू हमन जेन बात ला अपन गलती समझथन, ओही घटना हमर आगू ककरो मदद करे के अवसर बनके आ जथे।

ओ रात मोला एकठन अनमोल सीख मिलिस—मनखे के असली बड़प्पन ओकर पद, पैसा या प्रतिष्ठा मँ नइ, बल्कि दूसर मनखे के दुख ला समझे अउ जरूरत के बखत ओकर मदद करे मँ हे।

ककरो परेशानी मँ ओकर सहारा बनना, ककरो डर के बखत ओकर हिम्मत बनना अउ ककरो आँसू पोंछके ओकर चेहरा मँ मुस्कान लाना—एखर ले बड़े पुण्य के काम अउ का हो सकथे?

कभू-कभू भगवान हमर ले बड़े काम करवाय बर हमन ला अइसने अनजाने रद्दा मँ ले जथे, जिहाँ हमर एकठन छोटकुन मदद घलो दूसर मनखे बर बड़े सहारा बन जथे।

ओ रात मँ चाम्पा उतरना भुला गे रहेंव, फेर रायगढ़ मँ एक बहिनी के मदद करे के मौका मिलिस। एखरे सेती आज घलो मोर मन मँ एके भावना उठथे—

“जिनगी मँ सफल होना बड़े बात नइ ये, ककरो जरूरत के बखत काम आना बड़े बात हे।”

— हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा

जुलाई 08, 2020

छत्तीसगढ़ी साहित्य के भाषा मा उपलब्धता

छत्तीसगढ़ी साहित्य के भाषा मा उपलब्धता

रचनाकार : हेमलाल साहू

छत्तीसगढ़ के माटी मा अनेक कवि अउ लेखक मन अपन कविता, लेख अउ कहानी के माध्यम ले साहित्य रचत आवत हें। हमर पुरखा मन के कतको रचना आज तक प्रकाशित नइ हो पाइस, फेर ओमन जनमानस मा लोकप्रचलित रहिन। आज घलाव कतको ददरिया, सुवा गीत, करमा गीत, भरथरी गीत, लोकगाथा, पंथी गीत, किसिम-किसिम के हाना अउ रंग-बिरंगी कहानी सुने ला मिलथे। ये सबो रचना मन के पुस्तक के रूप मा प्रकाशन नइ होय के कारण ओमन के रचनाकार मन के नाम आज हमन नइ जानन। फेर अपन उच्च कोटि के साहित्यिक गुणवत्ता के कारण ये रचना मन पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम ले एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी तक पहुँचत आवत हें। आज एमा ले बहुत अकन रचना मन ला संग्रहित करके रखे गे हे। फेर आज घलाव कतको रचना हमर बीच मौखिक रूप मा जनमानस तक पहुँचत हें अउ सुने ला मिलथें।

देखत-देखत जमाना बदलत गिस। प्रिंट मीडिया अउ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास होइस। ए समय म हमर पुरखा कवि अउ लेखक मन कतको रचना रचिन अउ अपन किताब घलाव छपवाइन। फेर ये किताब मन छत्तीसगढ़ी जनमानस तक ओतका नइ पहुँच पाइन, जेतका पहुँचई के जरूरत रहिस। जेन कविता, कहानी अउ गीत मन जनमानस तक पहुँचिन, ओमन म ले बहुत अकन रचना लोककला के माध्यम ले या रेडियो प्रसारण के जरिए लोगन तक पहुँच पाइन।

एकर कई ठन कारण हो सकत हें। पहिली बात, ओ समय छत्तीसगढ़ अलग राज्य नइ बनिस रहिस। छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश के हिस्सा रहिस। हो सकथे कि ओ समय शासन-प्रशासन के स्तर मा छत्तीसगढ़ी भाषा अउ साहित्य ला ओतका महत्त्व नइ मिलत रहिस, जेतका मिलना चाही रहिस। दूसर बात, ओ समय गाँव-गाँव मा शिक्षा के पर्याप्त सुविधा नइ रहिस। गाँव के बहुत अकन मनखे मन पढ़े-लिखे नइ रहिन। यदि ओमन करा किताब रहितिस, तब घलाव पढ़े-लिखे के कमी के कारण साहित्य तक पहुँच पाना कठिन रहितिस।

धीरे-धीरे लोगन मन शिक्षित होय लगिन। छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव ले पढ़े-लिखे मनखे निकलिन अउ बड़े-बड़े पद मा काम करे लगिन। फेर दुख के बात ये रहिस कि हमर पढ़े-लिखे समाज के एक बड़े हिस्सा हा अपन भाषा अउ साहित्य ला ओतका महत्त्व नइ दिस। कुछ मनखे मन ला अइसन लगत रहिस कि छत्तीसगढ़ी बोले अउ पढ़े ले लोगन ओमन ला गंवार समझहीं। ए सोच के कारण कतको शिक्षित मनखे मन अपन मातृभाषा अउ साहित्य ले दूरावत गिन।

वास्तव मा, ये शिक्षित मनखे मन गाँव-गाँव मा छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रचार-प्रसार कर सकत रहिन। ओमन अपन भाषा के कविता, कहानी अउ लेख ला पढ़के, सुनाके अउ दूसर मन ला पढ़े बर प्रेरित करके छत्तीसगढ़ी साहित्य के परचम लहरा सकत रहिन। फेर अपन साहित्य के प्रति उदासीनता के कारण हमर पुरखा मन के कतको किताब अउ रचना जनमानस तक नइ पहुँच पाइन।

अब आज के जमाना के बात करथन। प्रिंट मीडिया अउ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद संचार क्रांति के माध्यम ले मोबाइल अउ इंटरनेट के व्यापक उपयोग होवत हे। सोशल मीडिया आज समाज के अलग-अलग वर्ग तक पहुँच गे हे। फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर अउ ब्लॉग जइसन माध्यम मन साहित्य के प्रचार-प्रसार के नवा रद्दा खोलिन हें।

आज छत्तीसगढ़ी साहित्य के उपलब्धता के बात करन, त डिजिटल माध्यम मन साहित्य ला जनमानस तक पहुँचाय के महत्त्वपूर्ण साधन बन गे हें। भले ये साहित्य छपे किताब के रूप मा नइ होवय, फेर डिजिटल माध्यम मा उपलब्ध रचना मन घलाव किताब के साहित्यिक महत्त्व रखथें। आज कतको कवि अउ लेखक मन अपन ब्लॉग के माध्यम ले रचना मन ला सुरक्षित रखत हें। ए माध्यम के सबसे बड़े फायदा ये हे कि मनखे मन अपन सुविधा के अनुसार, कोनो भी जगह बइठ के, मोबाइल या कंप्यूटर मा साहित्य पढ़ सकथें।

एकर ले बड़े उपलब्धि अउ का हो सकत हे कि हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य आज इंटरनेट के माध्यम ले देश-दुनिया तक पहुँचत हे!

आदरणीय संजीव तिवारी जी के 'गुरतुर गोठ डॉट कॉम' ब्लॉग मा कतको नवा अउ जुन्ना रचनाकार मन के रचना उपलब्ध हें। ए ब्लॉग छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य अउ संस्कृति के संरक्षण अउ प्रचार-प्रसार मा महत्त्वपूर्ण योगदान देत हे।

इही किसम ले आदरणीय रमेश सिंह चौहान जी घलाव अपन संकलन अउ ऑनलाइन माध्यम के जरिए रचना मन ला पाठक तक पहुँचाय के काम करत हें। ऑनलाइन किताब के उपलब्धता अउ बिक्री के माध्यम ले पाठक मन घर बइठे साहित्य तक पहुँच सकथें।

फेर एक सवाल आज घलाव हमर सामने खड़े हे—का हमर किताब मन के बिक्री संतोषजनक होवत हे? का पाठक मन छत्तीसगढ़ी साहित्य के किताब खरीदे अउ पढ़े बर पर्याप्त रुचि दिखावत हें? आज के परिस्थिति ला देखके साहित्य के किताब मन के बिक्री अउ पाठक संख्या के भविष्य के बारे मा चिंता होना स्वाभाविक हे। फेर ए बात ला घलाव नकारे नइ जा सकय कि आज डिजिटल माध्यम हमर साहित्य बर एक बड़े अवसर के रूप मा उभर के आइस हे।

आज डिजिटल युग हे। लोगन मन अपन जरूरत के बहुत अकन चीज ऑनलाइन खोजथें। अइसने म हमर साहित्य ला घलाव डिजिटल माध्यम मा उपलब्ध कराय के जरूरत हे। किताब छपवाना गलत नइ हे, फेर साहित्य ला केवल छपे किताब तक सीमित रखना उचित नइ हे। हमन ला छपे किताब के संग-संग ऑनलाइन साहित्य के उपलब्धता ऊपर घलाव जोर देना चाही।

ए दिशा मा हमर छंद परिवार हा बढ़िया काम करत हे। 'छंद खजाना' अउ 'गद्य खजाना' ब्लॉग के माध्यम ले लगभग अस्सी कवि मन के कविता अउ लेख ऑनलाइन उपलब्ध कराय गे हें। ए माध्यम ले देश-दुनिया के पाठक मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पढ़ सकथें। ए प्रयास हमर भाषा अउ साहित्य के संरक्षण, संवर्धन अउ प्रचार-प्रसार के दिशा मा महत्त्वपूर्ण कदम हे।

हमर साहित्य के उपलब्धता के सही अर्थ केवल ए नइ हे कि हमर रचना मन इंटरनेट मा रखे गे हें। असल उपलब्धता तभे सार्थक होही, जब पाठक मन ओला खोज सकहीं, पढ़ सकहीं, समझ सकहीं अउ अपन जीवन मा ओकर महत्त्व ला महसूस कर सकहीं। साहित्य के ऑनलाइन उपलब्धता के संग-संग ओकर गुणवत्ता, भाषा के सहजता अउ पाठक तक पहुँच के व्यवस्था घलाव जरूरी हे।

आज हमला किताब छपवाय के लालसा ले ऊपर उठके साहित्य के व्यापक प्रचार-प्रसार के बारे मा सोचे ला परही। एकर मतलब ये नइ हे कि किताब छपवाना बंद कर देय जाय। किताब के अपन महत्त्व हे अउ ओला बनाए रखना जरूरी हे। फेर आज के समय मा डिजिटल माध्यम ला अपनाके साहित्य के पहुँच ला अउ व्यापक बनाय जा सकथे।

मोबाइल ला पढ़े-लिखे के साधन बनाके, ब्लॉग मा उच्च गुणवत्ता के रचना मन ला सुरक्षित रखके अउ फेसबुक अउ व्हाट्सऐप जइसन सोशल मीडिया के माध्यम ले साहित्य के प्रचार-प्रसार करके हमन अपन भाषा ला जन-जन तक पहुँचा सकथन। ए संग-संग समाचार-पत्र, पत्रिका अउ किताब मन मा घलाव छत्तीसगढ़ी साहित्य ला नियमित जगह मिलना चाही।

हमर रचना मन के भाषा सरल, सहज अउ जनमानस के समझ मा आवइया होना चाही। एकर संग साहित्यिक गुणवत्ता, मौलिकता अउ विचार के गहराई घलाव बने रहना चाही। जब हमर साहित्य मा लोकजीवन, लोकसंस्कृति, लोकपरंपरा, सामाजिक समस्या अउ मनखे के सुख-दुख के सजीव चित्रण होही, तब पाठक मन ओकर संग अपन जुड़ाव महसूस करहीं। अइसने साहित्य पाठक मन के रुचि बढ़ाही अउ हमर भाषा ला मजबूत बनाही।

अंत मा ए बात कहना उचित होही कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के भविष्य केवल किताब के प्रकाशन मा नइ, बल्कि ओकर व्यापक उपलब्धता, पाठक तक पहुँच अउ साहित्य के प्रति जनमानस के रुचि बढ़ाय मा निहित हे। हमन ला अपन पुरखा मन के मौखिक साहित्य ला सहेजे के संग-संग आज के रचना मन ला घलाव डिजिटल अउ मुद्रित माध्यम मा सुरक्षित रखना हे।

जब हमर साहित्य जन-जन तक पहुँचही, तबे हमर भाषा के मान बढ़ही। जब पाठक मन हमर साहित्य ला पढ़हीं, तबे हमर साहित्य के विकास के रद्दा अउ मजबूत होही।

जय छत्तीसगढ़ी भाषा। जय छत्तीसगढ़ी साहित्य।

— हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

जुलाई 07, 2020

*चौमास*




           *चौमास* आषाढ़ महीना के शुक्ल पक्ष एकादशी ले शुरू होके कार्तिक महीना के शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन खत्म होथे। हमर किसानी जिनगानी के ओ चार महीना जेन खेती किसानी बर अड़बड़ महत्व रहिथे ये चार महीना मा खेत खार मा किसान अउ बनिहार मन खूब सेवा मन लगा के करथे। आषाढ़, सावन, भादो अउ कुंवार इहि चार महिमा मा बोनी, निदाई -कुड़ई ला सुग्घर करथे अउ फसल ला सुघ्घर तैयार करथे। वेद पुराण के हिसाब ले धर्म, कर्म, व्रत-उपवास, ईश्वर के ध्यान, साधना, तंत्र- मंत्र जप अउ दान धरम के पवित्र चार महीना ला चौमास (चौमासा) कहिथे।

*भगवान विष्णु के सोये के बेरा*
        वेद पुराण मा चौमास ला भगवान विष्णु के सोये (शयनकाल) के बेरा बताय हावय। ये चार महीना मा भगवान योग निद्रा मा रहिथे। वेद पुराण के अनुसार भगवान विष्णु हा वामन अवतार ले रहिस हावय। वामन अवतार मा भगवान विष्णु हा राक्षस राज बलि ले तीन पग भुइँया मांगे रहिस हावय अउ राजा बलि तीन पग भुइँया दान करे रहिस हावय। पहली पग मा भगवान वामन हा जम्मो पृथ्वी ला, आकाश ला अउ सब्बो दिशा ला ढंग लिस। दुसरइया पग मा जम्मो स्वर्ग लोग ला ले लिस। तीसरा पग बर कुछ नई बचिस त बलि हा अपन आप ला समर्पित करत भगवान ला अपन मुड़ मा पग ला रखे ला कहिथे।  भगवान बलि के दान ले खुश होके ओला पताल लोक के राजा बनाथे अउ वर मांगे ला कहिथे। राजा बलि भगवान मेर चार महीना पताल लोक मा रहे बर वर माँगथे। तब भगवान बलि के भक्ति ला देख के ओला वरदान देथे की चार मास पताल लोक मा रइही।  इहि चार मास पताल लोक मा भगवान योग निद्रा मा रहिथे। ये चौमास महीना मा वेद पुराण के अनुसार बिहाव, यज्ञ अउ शुभ काम ला नई करय।
*शिव परिवार करथे जग के रेख देख*
            धर्म शास्त्र के अनुसार जग के संचालन अउ रेख देख जगत पालन हार भगवान विष्णु हा करथे, फेर भगवान सोये बर चल देथे त सबो रेख देख जग के संचालन ला भगवान शिव अउ उँकर परिवार हा करथे। ये चौमासा मा शिव अउ उँकर परिवार ले जुड़े सब्बो व्रत तिहार ल मनाय जाथे। सावन महीना हा पूरा भगवान शिव ला समर्पित रहिथे। भक्त मन भगवान के उपवास रखथे अउ खूब पूजा अर्चना करथे। कतको भक्त मन ये महीना मा बाल दाढ़ी नई कटवावय। एकर बाद भादो मास मा भगवान गणेश के दस दिन ले जन्मोत्सव मनाय जाथे। कुंवार महीना मा शारदीय नवरात्रि मा दुर्गा दाई के बड़े धूम धाम ले पूजा भक्ति करथे।
*चौमास के वैज्ञानिक महत्व*
       चौमास के धार्मिक, सामाजिक के संग संग वैज्ञानिक महत्व तको हावय। ये चार महीना मा खान पान मा बड़ सावधानी बरते ला परथे।  बरसात के मौसम होय के कारण ये महीना मा सूरज के रौशनी हा भुइँया मा ढंग से नई पड़य पाय। हवा मा तको नमी रहिथे जेकर कारण बैक्टीरिया, कीड़ा मकोड़ा, छोटे छोटे जीव हवा मा अबड़ पनपथे। भाजी पाला मा नानम प्रकार के कीड़ा मन तको रहिथे। चौमासा मा हमर तन के पाचन शक्ति तको कमजोर रहिथे अउ कतको प्रकार के बीमारी मन तको फइले के डर बने रहिथे। चौमासा मा हल्का पुलका सुपाच्य  खाना खाय बर कहिथे। ये महीना मा मास, मछली खाय बर मनाही रहिथे।
*छत्तीसगढ़ मा चौमास के महत्व*
              हमर छत्तीसगढ़ मा चौमास आषाढ़, सावन, भादो अउ कुंवार महीना के बड़ महत्व हावय। छत्तीसगढ़ राज कृषि प्रधान राज आय अउ इहाँ के जम्मो मनखे मन खेतिहर जिनगी से जुड़े हावय। हमर छत्तीसगढ़ के खेती किसानी के शुरुवात ये चौमासा मा ही होथे बुवाई, रोपाई, निदाई जम्मो कार्य आषाढ़ से कुंवार तक होथे अउ इहि महीना मा ज्यादा रेख देख करे ला परथे। छत्तीसगढ़ मा तिहार के शुरुवात इहि चौमास ले होथे। पहली हरेली तिहार फेर इतिवार या सोमवार (सवनाही) तिहार,नागपंचमी, राखी तिहार, भोजली तिहार, कमरछठ, आठे कन्हैया, तीजा पोरा, गणेश चतुर्थी, पितर पाख अउ मा दुर्गा स्थापना शारदीय नवरात्रि। ये जम्मो तिहार ला छत्तीसगढ़ के लोग बाग मन बड़े धूम धाम से मनाथे। चौमासा मा कभू कभू दिन हा रात बरोबर लगथे काबर की बरखा रानी अपन रंग मा रहिथे ता ऊंखर करिया करिया बादल सुरुज देव् ला ढंग देथे अउ जग हा कुलप अँधियार हो जाथे। इहि चौमास मा नदिया, नरवा, तरिया, बाँध जम्मो लबालब भर जा रहिथे। चारो मुड़ा हरियर हरियर रुख राई देखे बर मिलथे अइसे लगथे जैसे स्वर्ग अउ धरती एक होंगे हावय। प्रकृति अपन चरम सीमा मा रहिथे अउ जन मानस ला अबड़ भाथे। किसान अउ बनिहार मन प्रकृति के बड़ मजा लेवत घाम, भूख - प्यास अउ दुख पीड़ा बुलाये खेतिहर काम ला करत रहिथे। कभू कभू ये चौमास मा बरखा रानी पानी नई गिराय अउ अकाल होय के डर रहिथे ता जम्मो परब मा किसान अउ बनिहार मन के पीड़ा ला छलकत देखे जा सकथे।
*छत्तीसगढ़ साहित्य मा चौमास
        मँय सुरता करावत हव हमर पुरखा कवि  अउ लेखक मन ला जेमन कतका सुघ्घर चौमास के बखान करे हावय................
1) *कवि कपिलनाथ कश्यप जी  के लेख "चौमासा"  मा पूरा चौमास के सुघ्घर बखान हावय। ऊँखर लेख चौमासा ला पढ़े मा मन ला विभोर कर देथे। 
2) जनकवि कोदूराम "दलित" जी के कविता ला देखव कतका सुग्घर बखान करे हावय.......
गीले होगे मांटी, चिखला बनिस धुरी हर,
बपुरी बसुधा के बुताइस पियास हर।
हरियागे भुइयां सुग्धर मखेलमलसाही,
जामिस हे बन, उल्होइस कांदी-घास हर।।
जोहत रहिन गंज दिन ले जेकर बांट,
खेतिहर-मन के पूरन होगे आस हर।
सुरुज लजा के झांके बपुरा-ह-कभू-कभू,
"रस-बरसइया आइस चउमास हर"।।
3) जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया जी के एक गीत ला देखव ......
*सावन आगे आबे आबे आबे संगी मोर*
रहि-रहि के माँदर कस बाजत अगास मा
खेती-खार छ्लछलावय, रिमझिम बरसात मा
तरिया ताल लबलबावय, नरवा नदिया डबडबावय
पुरवइया नीक लागे हो…...
झुलवा बँधागे पीपर-आमा के थांग मा
आगे हरेली, मजा लागय झूमर नाच मा
जुड़ जुड़हा सिपा मारय, घुर घुरहा हिया काँपय
पुरवइया नीक लागे हो…..
4) *कुंज बिहारी चौबे* (क्रांतिकारी कवि)
रहि रहि के गरजत हे बादर जी
बड़े बिहिनिया ले करे हे झक्कर जी
रुमझुम रुमझुम बरिसत हे पानी
कइसे मँजा के मोर खेती किसानी
रेंग बइला झप झप, झिन कर आंतर
चल मोर भइया बियासी के नांगर।
5) कवि *लाला जगदलपुरी* जी
खेती ला हुसियार बनाये बर
भुइयाँ मा बरखा आथे।
जिनगी ला ओसार बनाये बर
भुइयाँ मा बरखा आथे।
सोन बनाये बर माटी ला
सपना ल सिरतोन करे बर
आँसू ला बनिहार बनाये बर
भुइयाँ मा बरखा आथे।
6) पुरखा कवि *हरि ठाकुर* जी
भरगे ताल तरैया भैया भरगे ताल तरैया।
झिमिर झिमिर जस पानी बरसे
महकै खेतखार के माटी
घुडुर घुडुर जस बादर गरजै
डोलै नदिया परबत घाटी
नांगर धरके निकलिन घर से, सबै किसान कमैया।।
    
         अब मँय नवा कवि डहर आप सब मन के ध्यान ला लेगत हौवव। खासकर के छंद परिवार के कवि मन डहर जौन सुघ्घर सुघ्घर अलग अलग छंद मा सुघ्घर रचना करे हावय........
1) चौमास (शिव छंद)-जीतेंन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" के कविता के एक अंश ला देखव......
घन घनन घनन करे। सन सनन पवन करे।
रझ रझारझ जल झरे। खेत खार सर भरे।
चंचला चमक चमक। नैन मुँद तमक तमक।
नाचथे असाड़ मा। बन नदी पहाड़ मा।
2) *कुण्डलिया छंद--आशा देशमुख जी* के
*असाढ़* मा देखव.........
आगे हवय असाढ़ अब,हाँसत हवँय किसान।
नॉगर बइला ला धरे, अउ टुकनी मा धान।
 अउ टुकनी मा धान,खेत कोती जावत हें।
मन मा खुशी अपार,गीत मन भर गावत हें।
पानी बरसत देख,ताप भुइयाँ के भागे।
खेती मीत असाढ़,झमाझम नाचत आगे।
*3) वाम सवैया - बोधन राम निषादराज जी* के कविता मा देखव.......
भरे अब सावन मा धनहा अब देख किसान जुड़ावत हावै।
बियास करे सब धान ल देखव मूड़ उठा लहरावत हावै।।
इहाँ भुइँया सब डाहर सुग्घर सावन मा हरियावत हावै।
छमाछम बूँद ह नाचत गावत शोर घलो बगरावत हावै।।
*4) दुर्मिल सवैया जगदीश हीरा साहू जी* के *बरसे बदरा* के कविता ला देखव........
बरसे बदरा बिजली चमके, सुन झींगुर गीत सुनावत हे।
छइँहा खुसरे बइला गरुवा, सब जा परछी सकलावत हे।।
दबके बइठे मनखे घर मा, घबरावय जीव लुकावत हे।
नइ रेंगत हे रसता मनखे,  मन मा डर आज सतावत हे।।
*2) बरखा रानी सार छंद- हेमलाल साहू* जी के कविता के एक अंश देखव......
करिया करिया बादर देखत, हाँसत हे जिनगानी।
सबके मन मे आस जगत हे, आही बरखा रानी।1।
रुमझुम रुमझुम पानी बरसे, खड़े किसान दुवारी।
सावन भादो महिना आगय, रात लगे अँधियारी।।2।
         ये प्रकार ले छत्तीसगढ़ साहित्य मा जुन्ना मन के बाद नवा पीढ़ी के बहुत झन कवि मन चौमास के बखान करे हावय सबके रचना ला सामिल करहूँ त बहुत लम्बा लेख हो जाही ।
-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा

फ़रवरी 14, 2017

हमर छत्तीसगढ़ के मड़ई मेला

हमर छत्तीसगढ़ के मड़ई मेला


रचनाकार : हेमलाल साहू

हमर छत्तीसगढ़ माटी के एकठन प्रमुख परब (तिहार) मड़ई मेला हर आय। मड़ई के नाव लेतेंच मन मा उत्साह अउ उमंग भर जथे। ए तिहार ला हमर राउत भइया मन बड़े धूमधाम ले मनाथें। मड़ई मेला के आयोजन देवारी ले लेके महाशिवरात्रि तक अलग-अलग गाँव मा होवत रहिथे। मड़ई मेला के आयोजन राउत भइया मन अउ गाँव के लोगन मन मिलके करथें। मड़ई के आयोजन राउत मन के बदना (मानता) घलाव रहिथे। बदना के सेती एकर आयोजन के खरचा बदना बदइया मन उठाथें। मड़ई के आयोजन राउत समाज के कुलदेवता बर श्रद्धा अउ विश्वास के प्रतीक आय। राउत मन के मान्यता हे कि मड़ई कराय ले ओमन के कुलदेवता सदा सहाय रहिथें।

मड़ई मेला के आयोजन करे के पहली राउत भइया मन अपन जुराव करथें। जुराव मा गाँव के सियान मन ला बलाथें अउ मड़ई के दिन, तिथि अउ तारीख तय करथें। दिन तय होय के बाद गाँव मा हाँका परवाथें कि अमुक दिन हमर गाँव मा मड़ई मेला होही। आसपास के गाँव अउ बाजार तक घलाव हाँका परवाथें, ताकि मड़ई मा बढ़िया बाजार लगय अउ आयोजन सफल होवय।

राउत भइया मन अपन सगा-संबंधी अउ दूसर गाँव के राउत भाई मन ला नेवता भेजथें कि हमर गाँव मा अमुक दिन मड़ई मेला होही। एती गाँव मा मड़ई के नाव सुनतेच गाँव भर मा खुशी अउ उत्साह के लहर दउड़े लगथे। गाँव के लोगन मन अपन बेटी-माई, दीदी-बहिनी अउ सगा-संबंधी मन ला मड़ई के सोर पहुँचाथें। अपन बेटी-बहिनी मन ला मेला देखे बर लाने जाथें। राउत भइया मन गड़वा बाजा-गाजा के संग नचइया परी मन के घलाव जुगाड़ करथें, जेकर ले मड़ई मेला के रौनक अउ बढ़ जथे।

मड़ई मेला के दिन मुँधरा ले राउत भइया मन अपन कुलदेवता ला गाजा-बाजा के संग नाचत-कूदत, उमंग अउ उत्साह ले दोहा पारत गौठान (दइहान) मा मढ़ाथें। उहाँ देवता के भाव-भजन करथें। फेर गाजा-बाजा के संग गाँव के जम्मो देवी-देवता मन ला नरियर-सुपारी चढ़ाय बर नेवता देय जाथे अउ ओमन के भाव-भजन करे जाथे।

गाँव के किसान भाई मन ला घलाव नरियर के संग नेवता देथें। जम्मो किसान मन के घर नेवता देय बर राउत भइया मन गाजा-बाजा के संग नाचत-कूदत अउ दोहा पारत गली-गली जाथें। ए परंपरा मा पूरा गाँव के भागीदारी रहिथे। एखर ले मड़ई केवल राउत समाज के आयोजन नइ रहि जावय, बल्कि पूरा गाँव के एकता, भाईचारा अउ आपसी सद्भाव के परब बन जथे।

नेवता देय के बाद राउत मन गौठान मा जाके खीर अउ परसाद बनाथें। ओला कुलदेवता ला चढ़ाथें। नरियर-सुपारी सौंपके भाव-भजन करथें अउ देवता ला मनाथें। पूजा-पाठ के बाद खीर अउ परसाद ला सबो झन मिल-बाँट के खाथें। एखर ले आपसी प्रेम अउ मेल-मिलाप के भावना अउ मजबूत होथे।

एती राउतइन दीदी मन घलाव दइहान के बीच मा गोबर ले गोवर्धन बनाथें। मंझनिया होवत-होवत मड़ई मेला मा दुकान मन सज जाथें। ढेलवा, खिलौना, किसिम-किसिम के मिठाई, रंग-बिरंगी टिकली-फुकली अउ साग-भाजी के दुकान मन ले मेला के बाजार गुलजार हो जथे। मेला मा लइका मन के खुशी देखे लइक रहिथे। कोनो खिलौना खरीदे बर जिद करथे, त कोनो मिठाई खाय बर। मड़ई मेला के ए मनमोहक दृश्य ला देखके सबके मन जुड़ा जथे।

मंझनिया के बेरा गाँव के सगा-पहुना, घर के बेटी-माई, दाई-दीदी, भइया-भउजी, बबा-नाती अउ गाँव के जम्मो लोगन मन सज-धज के मेला देखे बर दइहान पहुँचथें। राउत मन के अलग पहनावा अउ पारंपरिक पोशाक सबके मन ला खूब भाथे। अपन पारंपरिक वेशभूषा मा सजे राउत भइया मन जब घर ले नाचत-कूदत, दोहा पारत अउ लाठी चलावत निकलथें, तब पूरा गाँव के वातावरण उत्साह ले भर जथे।

गड़वा बाजा के अलग-अलग धुन अउ परी मन के मस्त होके नचई सबके मन मोह लेथे। दइहान पहुँचके राउत मन सबले पहली नाचत-नाचत मड़ई के सात भाँवर घूमथें। फेर गाय मन ले गोवर्धन ला खुंदवाथें अउ जमके नाचथें। अपन लाठी के कला अउ ताकत के प्रदर्शन करथें। लाठी चलाय के कला, अखाड़ा के खेल अउ नाच-गान मड़ई के प्रमुख आकर्षण होथे।

जब दूसर गाँव के सगा राउत भाई मन के टोली मड़ई मा पहुँचथे, तब ओमन के स्वागत करे बर राउत मन के एक टोली आधा रद्दा तक नाचत-कूदत जाथे। फेर सबो झन लाठी चलावत, अखाड़ा खेलत, दोहा पारत अउ नाचत-कूदत ओमन ला दइहान तक लाथें। ए दृश्य देखे बर गाँव के लोगन मन के भीड़ लग जथे। सबके मन मा उत्साह अउ उमंग छाय रहिथे। गड़वा बाजा के गूँज, लाठी के खनक, दोहा के आवाज अउ नाचत राउत मन के टोली मड़ई मेला ला अउ भव्य बना देथे।

अइसने नाच-गान, पूजा-पाठ अउ आपसी मेल-मिलाप के बीच हमर मड़ई मेला के दिन बीतथे। रातभर चलइया ए आयोजन के उत्साह अउ उमंग भोर होवत-होवत शांत हो जथे। फेर मड़ई के याद मन मा बहुत दिन तक बसे रहिथे।

दूसर दिन राउत भइया मन गाजा-बाजा के संग अपन किसान भाई मन के घर जाथें, जोहार-भेंट करथें अउ सहयोग बर आभार प्रकट करथें। ए परंपरा हमर गाँव के आपसी संबंध, प्रेम अउ भाईचारा के सुंदर उदाहरण आय।

ए प्रकार ले हमर मड़ई मेला के आयोजन होथे। एकर भव्यता, उत्साह अउ लोकसंस्कृति के रंग के बखान करना आसान नइ हे। मड़ई मेला हमर छत्तीसगढ़ माटी के खुशबू अउ हमर चिन्हारी आय। ए केवल एकठन तिहार नइ, बल्कि हमर लोकजीवन, लोकआस्था, लोककला अउ सामाजिक एकता के प्रतीक आय।

फेर आज चिंता के बात ये हे कि हमर पारंपरिक मड़ई मेला धीरे-धीरे कम होवत जात हे। पहिली गाँव-गाँव मा मड़ई मेला के आयोजन होवत रहिस, फेर आज बहुत अकन गाँव मा ए परंपरा कमजोर पड़त दिखत हे। एकर कारण राउत समाज के उदासीनता आय कि आर्थिक मजबूरी, एखर ऊपर विचार करे के जरूरत हे। मड़ई मेला के आयोजन मा आर्थिक खरचा लगथे। गाजा-बाजा, परी मन के व्यवस्था, पूजा-पाठ अउ दूसर जरूरी काम बर पर्याप्त साधन के जरूरत पड़थे। ए स्थिति मा केवल राउत समाज के भरोसा ए परंपरा ला बचाय बर पर्याप्त नइ हो सकय।

हमर मड़ई मेला ला बचाय अउ आगे बढ़ाय बर समाज के संग शासन-प्रशासन के सहयोग घलाव जरूरी हे। शासन ला चाही कि गाँव के पंचायत मन ला पारंपरिक मड़ई मेला के आयोजन बर आवश्यक सहायता राशि देय जाय। संगेसंग स्थानीय समाज, युवा पीढ़ी अउ सांस्कृतिक संगठन मन ला घलाव एखर संरक्षण बर आगे आना चाही।

यदि हमन अपन पुरखा मन के ए अनमोल परंपरा ला सहेजे के प्रयास नइ करबो, त आने वाला पीढ़ी मन हमर ए सांस्कृतिक धरोहर ले दूर हो सकथें। मड़ई मेला के संरक्षण केवल एक तिहार के संरक्षण नइ, बल्कि हमर छत्तीसगढ़ी संस्कृति, लोकपरंपरा अउ सामाजिक एकता ला बचाय के काम आय।

हमर माटी के खुशबू, हमर लोकसंस्कृति के मान अउ हमर छत्तीसगढ़ के चिन्हारी—मड़ई मेला हर आय। आवा, हमन सबो झन मिलके ए अनमोल परंपरा ला सहेजबो अउ आने वाला पीढ़ी तक पहुँचाबो।

— हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

नवंबर 22, 2016

भींगे अँचरा दाई के

           आगे देवारी तिहार कहाँ अंजोर आये घर दुवार। देख आँखी ले आँसू बोहावत भींगत अँचरा दाई के। घर के बेटा परबुधिया होंगे , आस कहाँ कोउनो भाई के। सबो राज पाठ परदेसिया करय कहाँ बाँचय लाज बेटी माई के। घर के बेटा दारू मा चूर हवे उतरत रोज लाज बेटी माई के। बेटा ला का फरक पड़े बने दलाल बेचत लाज माई के। भाई के गर भाई काटे देख परोसी करै राज ला। अपन जाँगर के भरोसा छोड़ आज बनगे सबो अलाल। खेती खार सब बेच  खाये अब घूमे कुकुर बनके जात। सबो जगह लात खात फिर भी समझ नई आत। कब समझही माटी के पीरा रखही कब लाज बेटी माई के। जागव भैया अब अपन हक ला पहचानव जी। दारू के संग छोड़ काम मा हाथ बँटावव जी। माटी दाई के लाज रखव परदेसिया राज हटावव जी। बनव जागरूक मनखे अब बईमान ला भगाव जी। दाई के आँसू पोछव बोलव महतारी भाखा ला। पइसा खातिर झन बेचव अपन मान ईमान ला। करत हेम विनती हवे रैहव सबो सुख मा। राखव बिस्वास ला भाई भाई झन करव मनमानी जी। करव राज मिलके भाई भाई  तब आही देश मा नवा अंजोर जी।

-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
छत्तीसगढ़ मो. 9977831273

सितंबर 03, 2016

तीजा पोरा के दरद


       आज आठे ला मनाय चार दिन होगे हवे। देख तीजा लिहइया मन के आवई जावई चलत हवै। तिजहारिन दीदी बहनी मन आत जात हवै। मोटर बस के भीड़ के ठिकाना नई हवे। तीजा पोरा तिहार हमर छत्तीसगढ़ के बड़का तिहार आय। इहि तिहार में गाँव भरके बेटी माई एक जगह सकलाथे। अपन अपन दुःख सुख ला गोठियाथे। धन्य हवै हमर गाँव  तीजा पोरा के तिहार मा गाँव भरके बेटी माई सकलाही। जय हो मोर छत्तीसगढ़ तोर महिमा अपरम्पार।

       फुलमतिया अपन नोनी के मुड़ी ला कोरत हवै। नोनी दाई ला कहत हवे जल्दी कोर दाई इसकूल बर देरी होत हवे मोर सहेली मन गोरत हवै। नोनी सात बरस के होगे हवे दूसरी किलास में पढ़त हवै। नोनी बड़ चंचल सवभाव के हवे। मुड़ ला कोरा के इसकूल जाथे अपन संगवारी धनिया संग। इसकूल जाथे त पता चलथे की ओकर एकझन संगवारी फुलेसवरी हा ममा गाँव चल दे हवे। धनिया से नोनी पूछथे ममा गाँव काय होथे यार अउ मोर घर तो एको साल मोर ममा नाव के नई आय। धनिया हाँसत हाँसत बताथे। ममा गाँव माने दाई के गाँव जिहा ममा मामी, ममादाई बाबू, मौसी अऊ भाई बहनी रथे। नोनी अरे वाह मजा आत होही न, धनिया हव यार ममा गाँव जाबे त कोनो मारे न पिटे चारो मुड़ा ले मया दुलार मिलथे। रंग रंग के खाय ला अउ पहिरे ला मिलथे। नोनी के तको मन में ममा गाँव के लालसा जाग जथे। इसकूल के छुट्टी होगे। नोनी घर आके संगवारी संग खेले  के धुन में हवै। ओतके बेरा धनिया ला ओकर दाई बुला के ले जथे चल तोर ममा गाँव जाबो। नोनी ला अपन ममा गाँव के सुध लग जथे अऊ घर कुती अपन आ जथे मन मा सोचत रथे सबके ममा बबा मन लेगे ला आथे। मोर ममा, बबा मन काबर हमन ला लेगे ला नई आय।  नोनी घर में आके अपन दाई ला पूछथे दाई हमर ममा मन एको साल काबर नई आय लेगे ला। सबके ममा मन अपन दीदी बहनी के संग में भांची भाचा ला लेगे ला आथे। एतका बात ला सुनके नोनी के दाई के आँखी ले आँसू तरतर तरत निकले लागथे। ओकर आँखी मा दाई बाबू, भाई बहनी, संगी संगवारी के चेहरा झुलगे। ओकर जवानी के घाव हा ताजा होगे। चुपकन आँसू ला दबाके मनमें ढाढ़स बंधाके नोनी ला कथे कइसे करबे नोनी तोर ममा मन लेगे ल नई आय त, बरपेली कइसे चल देबो। नोनी कथे हमर जम्मो संगवारी मन ममा गाँव जात हवै महूँ ला ममा गाँव देखे के सउख लागथे दाई। ऊहो ममा दाई, बबा, ममा मामी उकर लइका मोर भाई बहनी होही न दाई। फुलमतिया नोनी के बात ला सुन सिसकपरथे अऊ ओकर आँखी ले आँसू निकल जाथे।नोनी दाई ला देखके कथे देख हमर दाई ला नाव लेते ही मया पलपलावत हवै अऊ सुरता मा रोवत हवे। नोनी तको रोय ला धर लेथे अऊ कथे का होगे दाई हमर ममा मन ला मया नई लागे त। महतारी हा नोनी ला पोटार बोम फाड़के रो डरथे। ओतके बेरा नोनी के ददा समारू आ जथे अऊ कथे तुमन काबर रोवत हव। मोर रहत ले काबर चिंता करथव कुछ कमी हवै त बताव। दुनो झन के आँसू ला पोछथे अऊ चुप कराथे। समारू समझ जथे तीजा पोरा आय हवै त दाई बाबू दीदी बहनी भाई के सुरता में रोवत हवै कहिके।नोनी रोवत रोवत सुत जथे। समारू कथे फुलमितया में जान डरेव तोर दरद ला ओ 7 बछर होगे हमन ला अपन गाँव से अलग करै। भगवान के दया से येदे रइपुर शहर में जियत खात हन बने नउकरी करके फेर अपन जनम भुइया अऊ महतारी के सुरता नई भुला पाये हन। हा सही कहत हस जी ओतेक दिन ले अपन मन ला मारके रहत रहेंव फेर आज नोनी ममा गाँव जाय बर कहत रहिस हवै त में अपन आप ला नई रोक पाय हव। तीजा पोरा तिहार हर बेटी के बड़का तिहार आय। कोन बेटी अपन दाई ददा के ये तिहार ला छोड़ सकत हवै।बोरो महिना के ये तिहार में गाँव के जम्मो संगी संगवारी, गाँव भर के बेटी माई सकलाही अऊ अपन सुख दुःख गोठियाही। जेने अभागा रही तेने ये तिहार ला छोड़ही। फुलमितया हा समारू बर खाना लगाथे फेर ओला गाँव के सुरता आ जथे अपन दाई ददा भाई बहनी के कौरा मुँह में जाबे नई करय। समारू भात ला छोड़ उठके रेंग देथे। फुलमतिया तको बिन खाय सो जथे। फुलमितया समारू ला कथे हमर करम के भोगना आज हमर लइका भोगत हवे। बपरी ककरो का बिगाड़े हवै। बस एतके न की ओ हमर लइका बनके आय हवै। बपरी इहि गलती कर परे हे। समारू फुलमतिया हमर लइका के ये सउख हमन नई पूरा कर सकन ओला कोन समझाही की हमन अपन समाज अपन गाँव ले बाहिर हन। समारू मन ला मार दसना ले उठके गली डहर चल देथे ओकर मनके दरद सहन नई होय अऊ रो परथे। फुलमिया के मन मा आज कई ठन सवाल उठत हवै। अपन आप ला कोसते की मै बहुत बड़े गलती कर परेव मोला भाग के दुसर जात मेर सादी नई करना रहिस हवै। मोला अपन दाई ददा के मान मर्यादा रखना रहिस हवै। मोर दाई बाबू ऊपर का बीतिस होही कइसे 7 बछर उकर बीतिस होही। फेर फुलमितया कथे फेर मोर गलती का रहिस हवै में तो अपन साथ में पढ़े लिखे लड़का मेर सादी करै हव। महूँ हा पढ़ै लिखे हव महूँ ला समझ हवै। समाज ला कथे वाह रे मोर समाज अपन दाई ददा अऊ मया जार ले दूर कर दे। तोला थोरको दया नई आईस। फेर नोनी ला देख कथे में अपन बेटी ला का बताहू। कइसे ओला मानहु की तोर ममा घर नई जा सकन कहिके। नोनी बाड़ जहि त मोर बारे में का सोचही आज फुलमितया ला अपन गलती के पछतावा होत हवै ओकर जी हा आज कचोटत हवै। अपन समाज मेर चीख चीख के पूछत हवै मोर गलती के सजा मोर बेटी ला काबर मिलत हवै। बपरी ममा गाँव जाहू कहत हे तीजा पोरा मनाय ओला कोन लेगही। फेर हर बछर के तीजा पोरा मा ये घाव हा हरा  हो जाही संग में मोर बेटी भोगही। फेर कथे धन्य हे नियाव करने वाला भगवान अऊ धन्य हे हमर समाज नियम बनाने वाला।

-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
(छत्तीसगढ़) मो.9977831273

अगस्त 08, 2016

छत्तीसगढ़ के सुध कोन लेही


       हमर छत्तीसगढ़ ला राज् बने सोलह बछर होगे। सोला बछर में नवा नवा इतिहास लिखागे।
हमर माटी के किसमत तको बदलगे। बढ़िया बढ़िया गाँव में सरपंच, पंच बनिस त गाँव मन के भाग खुलगे। बढ़िया बढ़िया मन्त्री अऊ सरकार बनिस त हमर राज के काया पलटगे। हमर पुरखा के सपना तो आज पूरा होगे।
बड़ सपना देखे रहिस हमर राज बने बिकास करही कहिके। गाँव गाँव में सुराज आही कहिके। आज गाँव गाँव में निमगा सुराज आगे हवे लइका सियान सबो के मन बदलगे हवे। येहा आज के नवा अँजोर के परभाव आय। आँखी में देखबे अपन राज के बिकास ल त खुसी म आँखी ले आँसू आ जथे अऊ अबड़ सुख लगथे। हमर सियान हमर भविस के लइका मन सबो आज बिकास के जगा एक पउवा दारू के मांग करथे। गाँव तीर मन में तो दारू के भट्टी हवे। गाँव गाँव के सरपंच, पंच, सचिव मन के तो पांचो ऊँगली घी में रथे। अरे भई जब चुनाव म हमन दारू पीके अपन ओट डाले हन। फेर अपन हक ला कइसे मांग सकथन। अऊ उहू बपरा मन तो पइसा खरचा करे हवे निकालबे करही। अपन जेब ला भरे बर बने हवे बिकास बर थोड़े। हमर छत्तीसगढ़िया मनखे मन तको बड़ भुलाय हवे फोकट के चाँउर मिलत हवे का के ओला हे चिंता । आज उंकर जाँगर हा अलाल होगे ओला फेर नई देख पावत हवे।

       पढ़ाईया लइका मन के बाते निराला हवे काबर खाय ला मिलत हवे फोकट में। बपरा मन के दाई ददा मन खाना कहा देथे ये दरद ला हमर सरकार देखिस अऊ योजना ला बनाइस। आज पढ़ई ले जादा खाना जरुर हवे घर में तो लइका ला खाना मिलबे नई करय। बर कोउनो बड़ दुःख के बात आय हमर छत्तीसगढ़ीया मनखे ला तो अपन लइका बर मोह नई हवे। तेकर पाय के अपन लइका ला खाना नई खवाय ।  चलव ठीक हवे संगी इसकूल हा अब जिम्मा उठा ले हवे। पढ़ई के संग संग खवइ तको करही। आज तबे लइका मन बड़ होसियार हवे। भारी नालेज हवे फ़ैल तको नई होय। माने ल परही सरकार के योजना ला भई।

        कृषि बिकास म तो सरकार ह हर बछर पुरुसकार पावत हवे। हमर धान के उपज बड़गे हवे। तभे बपरा किसान मन के लागत हा नई छुटावत हवे। काबर आज धान के उपज बड़गे हवे, तभे बेपारी मन मनमरजी खरीदी ला करत हवे। आज धान के रेट गिर सकथे फेर बड़ नई सकय। अरे भई किसान के थोरे बाड़थे जी बेपारी मन के बाड़थे जी काबर उमन पहुँच वाला होथे अऊ टेक्स पताथे।

         बात करे जाय हमर राजधानी सहर के त बिकास के नवा नवा अँजोर लाय हवे, तभे तो भई गाँव ले अपन राजधानी रइपुर जाबे त अइसे लागथे जइसे अपन राज ले दुसर राज में आगेव। अपन आप ला अकेला पाबे। चारो मुड़ा खचाखच भीड़ अऊ फटाफट हिंदी बोलिया। छत्तीसगढ़ी बोलिया कोउनो कोउनो पाबे। रइपुर में छत्तीसगढ़ी बोलथे तेन ला गवाँर देहाती कथे गा बड़ दुःख लागथे। अपन राज के भासा ला अपन सहर नई पुछय। अब हमला कहिबे पट छत्तीसगढ़िया सेर आन सहर रहय या गाँव अपन भाखा में दहाड़े ला नई छोड़न। कतको सिखोले अपन रद्दा में आ जथन, फेर काय करबे सामने वाले ला समझ नई आय त हिंदी म बोले ला परथे।

          रइपुर बड़का सहर हरे दू तीन दिन ले पूरा सहर ला घूम डरेव। अपन छत्तीसगढ़िया मनखे मन के बंगला देखे के चक्कर में। फेर कउनो कउनो छत्तीसगढ़ीया के घर ला बंगला वाले पाबे बाकि सबो बाहिर के आय। अपन राजधानी सहर में जाबे त अइसे लगथे जइसे इहा हमर कोउनो नई हवे।

      हमर सोला बछर के बिकास आज देख डरेन। हमर पुरखा के सपना पूरा होगे दोस काला लगाबो। हमर भाई मन चुप बइठे देखत हवे। हमर नेता मन बिकास के नाम बर कोंदा बउला होगे हवे। देखले हमर छत्तीसगढ़ के नेता मन ला सरकार चलाय के ताकत नई हवे। तभे तो बाहिर के ला सफा राज पाठ दे के चुप बइठे देखत हवे। हमर भाखा के कउनो सुध नई लय न हमर माटी दाई के। जय हो हमर सरकार अऊ हमर राज के महामानव मनके। गोठ बात में सरग ला अमर देथे। फेर अमन राज के बिकास बर चुप हो जथे।

-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
(छत्तीसगढ़) मो. 9977831273

जुलाई 29, 2016

@चिरई के गाँव गिधवा@

      संगवारी हो आज मेहा अपन गाँव के बारे में बतावत हव मोर गाँव गिधवा हरे, पोस्ट नगधा, थाना नांदघाट, तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा। मोर गाँव भाटापारा सहर ले 30 किलोमीटर, मुंगेली सहर ले 30 किलोमीटर, रइपुर सहर ले 75 किलोमीटर, बिलासपुर ले 70 किलोमीटर अऊ बेमेतरा सहर ले 70 किलोमीटर हवे। आपमन चारो मुड़ा ले आ सकत हव  बस के सुविधा हवे गाँव मेन रोड में परथे। आपमन ला नाव से ही पता चलत हवे गिधवा (गिध्द) चिरई के नाव आय सिरतोन में सही आय संगी मोर गाँव के नाव गिध्द के कारन गिधवा परिस हवे। गाँव के डोकरा बबा अउ सियान मन बताव संगी हमर गाँव में बड़े बड़े गिद्ध के बसेरा रहिस। गाँव के खार हा बन बरोबर रहिस कउनो मनखे बन अंदर नई जाय सकत रहिस। गाँव में नानम परकार के चिरई के डेरा रहय अउ उकर खाय पिए के कमी तको नई रहिस। फेर आज समे ला देख ले मोर गाँव के बन उजर गे, गिद्ध के डेरा सिरागे। मोर गाँव बड़ सुघ्घर हवे 54 एकड़ के बड़का जनी तरिया हवे आज तक न हमर ददा के सुरता म न बबा के सुरता म तरिया  के गहरी करन होय हे। आज तलाब हा उतली होगे हवे। जेन तलाब में बारो महीना पानी भरे रहय तेन तरिया में गरमी म एक खोची पानी नई बाँचय। तरिया  में नानम परकार के चिरई रहय सुघ्घर सुघ्घर फूल खिले रहय। आज भी तरिया म पानी रथे त नानम परकार ले चिरई देखे जा सकत हवे। हमर गाँव के बाँध तको अति सुघ्घर हवे 200 एकड़ के बाँध हवे फेर गहरा करन के मांग हवे। पानी भरते त रंग रंग के चिरई ला देखे जा सकत हवे। हमर गाँव के माटी चिरई चिरगुन ला अबड़ रास आथे। आज हमर गढ़ के पहली पक्षी विहार प्रस्तावित हवे फेर शासन के लापरवाही देख जा सकत हवे आज तक काम शुरू नई होय हवे। आसो सुक्खा के कारन तरिया अउ बाँध दुनो हा सूखा गे रहिस जेकर ले चिरई मन बिचकगे अगर शासन धियान ला नई दीही त गिधवा गाँव नाव के बस रही जहि अऊ चिरई चुरगुन सिरा जाही।

हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा।
मो न 9977831273

जुलाई 17, 2016

@ढेकी@


          ढेकी हमर छत्तीसगढ़ के धन कुट्टी मसीन आय। ढेकी के नाव लेवत ओकर फोटो आँखी मा झूले ला धर लेथे। पुरखा के हमर निसानी आय फेर आज समे के साथ नंदागे। फेर आज भी ककरो ककरो घर देखे ला मिलथे।  पहली जवाना में साधन नई रहिस त एकरे उपयोग करत रहिस। आज आधुनिक साधन आय के बाद भले ढेकी हा नंदागे हावेे। फेर अपन समय म अबड़ काम के रहिस। आज भी ढेकी के उपयोग कउनो कउनो घर मा  करत हवे। आज के लइका मन ला पुछबे त काला ढेकी कथे बोलथे। ओला पता तको नई हवे  अऊ जानत तको नई हवे।ढेकी छत्तीसगढ़ के धान कुटे के मसीन आय। एमा पइसा या रुइया के जरूरत नई लगय मनखे के जाँगर अऊ समय के जरूरत पड़थे। ढेकी मसीन ला बनाय के समान ओकर भाग सबले पहली एकठन मोटा अकन डाड़ी जेला बढ़ई हा छोल चाच के लमसोर करथे आगू हा मोठहा अऊ पाछू हा पतला पाछू भाग ला छेद करथे जेमा थरा लगथे। एकर बाद एकठन मुसरी बनाय जाथे जेन हा लकड़ी के गोल रथे अऊ लोहा के चूड़ी पहिनाथे। पखना के बाहना बनाय जाथे पखाना ला गड्डा करके गोल रखे जाथे, दुठिन धुरखिली लगथे, अऊ एकठन थरा जोन डाड़ी के पाछू कुती लगथे दुनो धुरखिलि मा थरा मड़थे अऊ डाड़ी बिच मा। डाड़ी के पाछू में गड्डा रखथे ताकी ढेकी ला ऊपर नीचे कर सकय। डाड़ी, मुसरी, थरा, बहना, धुरा मिलके ढेकी बनथे। ढेकी ला चलाय बर दूँ मनखे लगथे एकझन कूटने वाला अऊ एकझन खोने वाला। ढेकी मा धान, दार, अउ कई जिनिस ला कूटथे। छरे के तको काम आथे। ढेकी मा मेहनत लगथे फेर बिजली अऊ पइसा के बचत करे जा सकत हवे जब भी खाली समय हवे ढेकी के उपयोग कर सकत हवे। ढेकी के कूटे चाउर मा स्वाद अबड़ रथे अऊ कनकी तको नई निकलय। पहली आधुनिक मसीन नई आय रहय त गाँव गाँव घरो घर ढेकी रखय। दिन भर काम बुता करके आतिस रतिहा आराम करतिस अउ चाँउर नई रतिस त होत बिहनिया पहरा के बेरा मा धान ला ढेकी मा कुटे के चालू कर दय। पारा परोस के मन तको जाग जाय अउ कहय देख मुधरहा होगे हवे फलाना घर के ढेकी बाजत हवे चाँउर सिरागे हवे त मुधरहा ला कूटत हवे। ढेकी के राग बड़ निक लागथे भुकरुस भुकरुस बजथे त। जब ढेकी मा धान कूटय ननन्द भौजाई ता  अबड़ हँसी मजाक होय। डोकरी दाई मन रंग रंग के हाना, किसम किसम के गोठ बताय। समे के पता तको नई चलय कब छीन बेरा होगे अउ धान तको कुटागे। अब तो मनखे मेरा ककरो मेर बात करे के समे नई हवे पहली के मन बुता काम करत करत कतका जिनगी के मजा लेवय। आज हमर ढेकी का सुरता बनके रहिगे हवे। छत्तीसगढ़ के नवा नवा लइका मन तो जानबे नई करय। हमर छत्तीसगढ़ीया भाई दीदी बहनी मन के फरज बनथे की हमर पुरखा के धरोहर ला संयोज के रखन। हमर आने वाला पीढ़ी मन जानय हमर जुन्ना धनकुट्टी मसीन ला।

पुरखा के चिन्हा हमर, रखबो संगी जतन।
जुग जुग ले सुरता रहै, नई देवन ग मिटन।।