जुलाई 08, 2020

छत्तीसगढ़ी साहित्य के भाषा मा उपलब्धता

छत्तीसगढ़ी साहित्य के भाषा मा उपलब्धता

रचनाकार : हेमलाल साहू

छत्तीसगढ़ के माटी मा अनेक कवि अउ लेखक मन अपन कविता, लेख अउ कहानी के माध्यम ले साहित्य रचत आवत हें। हमर पुरखा मन के कतको रचना आज तक प्रकाशित नइ हो पाइस, फेर ओमन जनमानस मा लोकप्रचलित रहिन। आज घलाव कतको ददरिया, सुवा गीत, करमा गीत, भरथरी गीत, लोकगाथा, पंथी गीत, किसिम-किसिम के हाना अउ रंग-बिरंगी कहानी सुने ला मिलथे। ये सबो रचना मन के पुस्तक के रूप मा प्रकाशन नइ होय के कारण ओमन के रचनाकार मन के नाम आज हमन नइ जानन। फेर अपन उच्च कोटि के साहित्यिक गुणवत्ता के कारण ये रचना मन पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम ले एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी तक पहुँचत आवत हें। आज एमा ले बहुत अकन रचना मन ला संग्रहित करके रखे गे हे। फेर आज घलाव कतको रचना हमर बीच मौखिक रूप मा जनमानस तक पहुँचत हें अउ सुने ला मिलथें।

देखत-देखत जमाना बदलत गिस। प्रिंट मीडिया अउ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास होइस। ए समय म हमर पुरखा कवि अउ लेखक मन कतको रचना रचिन अउ अपन किताब घलाव छपवाइन। फेर ये किताब मन छत्तीसगढ़ी जनमानस तक ओतका नइ पहुँच पाइन, जेतका पहुँचई के जरूरत रहिस। जेन कविता, कहानी अउ गीत मन जनमानस तक पहुँचिन, ओमन म ले बहुत अकन रचना लोककला के माध्यम ले या रेडियो प्रसारण के जरिए लोगन तक पहुँच पाइन।

एकर कई ठन कारण हो सकत हें। पहिली बात, ओ समय छत्तीसगढ़ अलग राज्य नइ बनिस रहिस। छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश के हिस्सा रहिस। हो सकथे कि ओ समय शासन-प्रशासन के स्तर मा छत्तीसगढ़ी भाषा अउ साहित्य ला ओतका महत्त्व नइ मिलत रहिस, जेतका मिलना चाही रहिस। दूसर बात, ओ समय गाँव-गाँव मा शिक्षा के पर्याप्त सुविधा नइ रहिस। गाँव के बहुत अकन मनखे मन पढ़े-लिखे नइ रहिन। यदि ओमन करा किताब रहितिस, तब घलाव पढ़े-लिखे के कमी के कारण साहित्य तक पहुँच पाना कठिन रहितिस।

धीरे-धीरे लोगन मन शिक्षित होय लगिन। छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव ले पढ़े-लिखे मनखे निकलिन अउ बड़े-बड़े पद मा काम करे लगिन। फेर दुख के बात ये रहिस कि हमर पढ़े-लिखे समाज के एक बड़े हिस्सा हा अपन भाषा अउ साहित्य ला ओतका महत्त्व नइ दिस। कुछ मनखे मन ला अइसन लगत रहिस कि छत्तीसगढ़ी बोले अउ पढ़े ले लोगन ओमन ला गंवार समझहीं। ए सोच के कारण कतको शिक्षित मनखे मन अपन मातृभाषा अउ साहित्य ले दूरावत गिन।

वास्तव मा, ये शिक्षित मनखे मन गाँव-गाँव मा छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रचार-प्रसार कर सकत रहिन। ओमन अपन भाषा के कविता, कहानी अउ लेख ला पढ़के, सुनाके अउ दूसर मन ला पढ़े बर प्रेरित करके छत्तीसगढ़ी साहित्य के परचम लहरा सकत रहिन। फेर अपन साहित्य के प्रति उदासीनता के कारण हमर पुरखा मन के कतको किताब अउ रचना जनमानस तक नइ पहुँच पाइन।

अब आज के जमाना के बात करथन। प्रिंट मीडिया अउ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद संचार क्रांति के माध्यम ले मोबाइल अउ इंटरनेट के व्यापक उपयोग होवत हे। सोशल मीडिया आज समाज के अलग-अलग वर्ग तक पहुँच गे हे। फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर अउ ब्लॉग जइसन माध्यम मन साहित्य के प्रचार-प्रसार के नवा रद्दा खोलिन हें।

आज छत्तीसगढ़ी साहित्य के उपलब्धता के बात करन, त डिजिटल माध्यम मन साहित्य ला जनमानस तक पहुँचाय के महत्त्वपूर्ण साधन बन गे हें। भले ये साहित्य छपे किताब के रूप मा नइ होवय, फेर डिजिटल माध्यम मा उपलब्ध रचना मन घलाव किताब के साहित्यिक महत्त्व रखथें। आज कतको कवि अउ लेखक मन अपन ब्लॉग के माध्यम ले रचना मन ला सुरक्षित रखत हें। ए माध्यम के सबसे बड़े फायदा ये हे कि मनखे मन अपन सुविधा के अनुसार, कोनो भी जगह बइठ के, मोबाइल या कंप्यूटर मा साहित्य पढ़ सकथें।

एकर ले बड़े उपलब्धि अउ का हो सकत हे कि हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य आज इंटरनेट के माध्यम ले देश-दुनिया तक पहुँचत हे!

आदरणीय संजीव तिवारी जी के 'गुरतुर गोठ डॉट कॉम' ब्लॉग मा कतको नवा अउ जुन्ना रचनाकार मन के रचना उपलब्ध हें। ए ब्लॉग छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य अउ संस्कृति के संरक्षण अउ प्रचार-प्रसार मा महत्त्वपूर्ण योगदान देत हे।

इही किसम ले आदरणीय रमेश सिंह चौहान जी घलाव अपन संकलन अउ ऑनलाइन माध्यम के जरिए रचना मन ला पाठक तक पहुँचाय के काम करत हें। ऑनलाइन किताब के उपलब्धता अउ बिक्री के माध्यम ले पाठक मन घर बइठे साहित्य तक पहुँच सकथें।

फेर एक सवाल आज घलाव हमर सामने खड़े हे—का हमर किताब मन के बिक्री संतोषजनक होवत हे? का पाठक मन छत्तीसगढ़ी साहित्य के किताब खरीदे अउ पढ़े बर पर्याप्त रुचि दिखावत हें? आज के परिस्थिति ला देखके साहित्य के किताब मन के बिक्री अउ पाठक संख्या के भविष्य के बारे मा चिंता होना स्वाभाविक हे। फेर ए बात ला घलाव नकारे नइ जा सकय कि आज डिजिटल माध्यम हमर साहित्य बर एक बड़े अवसर के रूप मा उभर के आइस हे।

आज डिजिटल युग हे। लोगन मन अपन जरूरत के बहुत अकन चीज ऑनलाइन खोजथें। अइसने म हमर साहित्य ला घलाव डिजिटल माध्यम मा उपलब्ध कराय के जरूरत हे। किताब छपवाना गलत नइ हे, फेर साहित्य ला केवल छपे किताब तक सीमित रखना उचित नइ हे। हमन ला छपे किताब के संग-संग ऑनलाइन साहित्य के उपलब्धता ऊपर घलाव जोर देना चाही।

ए दिशा मा हमर छंद परिवार हा बढ़िया काम करत हे। 'छंद खजाना' अउ 'गद्य खजाना' ब्लॉग के माध्यम ले लगभग अस्सी कवि मन के कविता अउ लेख ऑनलाइन उपलब्ध कराय गे हें। ए माध्यम ले देश-दुनिया के पाठक मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पढ़ सकथें। ए प्रयास हमर भाषा अउ साहित्य के संरक्षण, संवर्धन अउ प्रचार-प्रसार के दिशा मा महत्त्वपूर्ण कदम हे।

हमर साहित्य के उपलब्धता के सही अर्थ केवल ए नइ हे कि हमर रचना मन इंटरनेट मा रखे गे हें। असल उपलब्धता तभे सार्थक होही, जब पाठक मन ओला खोज सकहीं, पढ़ सकहीं, समझ सकहीं अउ अपन जीवन मा ओकर महत्त्व ला महसूस कर सकहीं। साहित्य के ऑनलाइन उपलब्धता के संग-संग ओकर गुणवत्ता, भाषा के सहजता अउ पाठक तक पहुँच के व्यवस्था घलाव जरूरी हे।

आज हमला किताब छपवाय के लालसा ले ऊपर उठके साहित्य के व्यापक प्रचार-प्रसार के बारे मा सोचे ला परही। एकर मतलब ये नइ हे कि किताब छपवाना बंद कर देय जाय। किताब के अपन महत्त्व हे अउ ओला बनाए रखना जरूरी हे। फेर आज के समय मा डिजिटल माध्यम ला अपनाके साहित्य के पहुँच ला अउ व्यापक बनाय जा सकथे।

मोबाइल ला पढ़े-लिखे के साधन बनाके, ब्लॉग मा उच्च गुणवत्ता के रचना मन ला सुरक्षित रखके अउ फेसबुक अउ व्हाट्सऐप जइसन सोशल मीडिया के माध्यम ले साहित्य के प्रचार-प्रसार करके हमन अपन भाषा ला जन-जन तक पहुँचा सकथन। ए संग-संग समाचार-पत्र, पत्रिका अउ किताब मन मा घलाव छत्तीसगढ़ी साहित्य ला नियमित जगह मिलना चाही।

हमर रचना मन के भाषा सरल, सहज अउ जनमानस के समझ मा आवइया होना चाही। एकर संग साहित्यिक गुणवत्ता, मौलिकता अउ विचार के गहराई घलाव बने रहना चाही। जब हमर साहित्य मा लोकजीवन, लोकसंस्कृति, लोकपरंपरा, सामाजिक समस्या अउ मनखे के सुख-दुख के सजीव चित्रण होही, तब पाठक मन ओकर संग अपन जुड़ाव महसूस करहीं। अइसने साहित्य पाठक मन के रुचि बढ़ाही अउ हमर भाषा ला मजबूत बनाही।

अंत मा ए बात कहना उचित होही कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के भविष्य केवल किताब के प्रकाशन मा नइ, बल्कि ओकर व्यापक उपलब्धता, पाठक तक पहुँच अउ साहित्य के प्रति जनमानस के रुचि बढ़ाय मा निहित हे। हमन ला अपन पुरखा मन के मौखिक साहित्य ला सहेजे के संग-संग आज के रचना मन ला घलाव डिजिटल अउ मुद्रित माध्यम मा सुरक्षित रखना हे।

जब हमर साहित्य जन-जन तक पहुँचही, तबे हमर भाषा के मान बढ़ही। जब पाठक मन हमर साहित्य ला पढ़हीं, तबे हमर साहित्य के विकास के रद्दा अउ मजबूत होही।

जय छत्तीसगढ़ी भाषा। जय छत्तीसगढ़ी साहित्य।

— हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

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