हमर छत्तीसगढ़ के मड़ई मेला
रचनाकार : हेमलाल साहू
हमर छत्तीसगढ़ माटी के एकठन प्रमुख परब (तिहार) मड़ई मेला हर आय। मड़ई के नाव लेतेंच मन मा उत्साह अउ उमंग भर जथे। ए तिहार ला हमर राउत भइया मन बड़े धूमधाम ले मनाथें। मड़ई मेला के आयोजन देवारी ले लेके महाशिवरात्रि तक अलग-अलग गाँव मा होवत रहिथे। मड़ई मेला के आयोजन राउत भइया मन अउ गाँव के लोगन मन मिलके करथें। मड़ई के आयोजन राउत मन के बदना (मानता) घलाव रहिथे। बदना के सेती एकर आयोजन के खरचा बदना बदइया मन उठाथें। मड़ई के आयोजन राउत समाज के कुलदेवता बर श्रद्धा अउ विश्वास के प्रतीक आय। राउत मन के मान्यता हे कि मड़ई कराय ले ओमन के कुलदेवता सदा सहाय रहिथें।
मड़ई मेला के आयोजन करे के पहली राउत भइया मन अपन जुराव करथें। जुराव मा गाँव के सियान मन ला बलाथें अउ मड़ई के दिन, तिथि अउ तारीख तय करथें। दिन तय होय के बाद गाँव मा हाँका परवाथें कि अमुक दिन हमर गाँव मा मड़ई मेला होही। आसपास के गाँव अउ बाजार तक घलाव हाँका परवाथें, ताकि मड़ई मा बढ़िया बाजार लगय अउ आयोजन सफल होवय।
राउत भइया मन अपन सगा-संबंधी अउ दूसर गाँव के राउत भाई मन ला नेवता भेजथें कि हमर गाँव मा अमुक दिन मड़ई मेला होही। एती गाँव मा मड़ई के नाव सुनतेच गाँव भर मा खुशी अउ उत्साह के लहर दउड़े लगथे। गाँव के लोगन मन अपन बेटी-माई, दीदी-बहिनी अउ सगा-संबंधी मन ला मड़ई के सोर पहुँचाथें। अपन बेटी-बहिनी मन ला मेला देखे बर लाने जाथें। राउत भइया मन गड़वा बाजा-गाजा के संग नचइया परी मन के घलाव जुगाड़ करथें, जेकर ले मड़ई मेला के रौनक अउ बढ़ जथे।
मड़ई मेला के दिन मुँधरा ले राउत भइया मन अपन कुलदेवता ला गाजा-बाजा के संग नाचत-कूदत, उमंग अउ उत्साह ले दोहा पारत गौठान (दइहान) मा मढ़ाथें। उहाँ देवता के भाव-भजन करथें। फेर गाजा-बाजा के संग गाँव के जम्मो देवी-देवता मन ला नरियर-सुपारी चढ़ाय बर नेवता देय जाथे अउ ओमन के भाव-भजन करे जाथे।
गाँव के किसान भाई मन ला घलाव नरियर के संग नेवता देथें। जम्मो किसान मन के घर नेवता देय बर राउत भइया मन गाजा-बाजा के संग नाचत-कूदत अउ दोहा पारत गली-गली जाथें। ए परंपरा मा पूरा गाँव के भागीदारी रहिथे। एखर ले मड़ई केवल राउत समाज के आयोजन नइ रहि जावय, बल्कि पूरा गाँव के एकता, भाईचारा अउ आपसी सद्भाव के परब बन जथे।
नेवता देय के बाद राउत मन गौठान मा जाके खीर अउ परसाद बनाथें। ओला कुलदेवता ला चढ़ाथें। नरियर-सुपारी सौंपके भाव-भजन करथें अउ देवता ला मनाथें। पूजा-पाठ के बाद खीर अउ परसाद ला सबो झन मिल-बाँट के खाथें। एखर ले आपसी प्रेम अउ मेल-मिलाप के भावना अउ मजबूत होथे।
एती राउतइन दीदी मन घलाव दइहान के बीच मा गोबर ले गोवर्धन बनाथें। मंझनिया होवत-होवत मड़ई मेला मा दुकान मन सज जाथें। ढेलवा, खिलौना, किसिम-किसिम के मिठाई, रंग-बिरंगी टिकली-फुकली अउ साग-भाजी के दुकान मन ले मेला के बाजार गुलजार हो जथे। मेला मा लइका मन के खुशी देखे लइक रहिथे। कोनो खिलौना खरीदे बर जिद करथे, त कोनो मिठाई खाय बर। मड़ई मेला के ए मनमोहक दृश्य ला देखके सबके मन जुड़ा जथे।
मंझनिया के बेरा गाँव के सगा-पहुना, घर के बेटी-माई, दाई-दीदी, भइया-भउजी, बबा-नाती अउ गाँव के जम्मो लोगन मन सज-धज के मेला देखे बर दइहान पहुँचथें। राउत मन के अलग पहनावा अउ पारंपरिक पोशाक सबके मन ला खूब भाथे। अपन पारंपरिक वेशभूषा मा सजे राउत भइया मन जब घर ले नाचत-कूदत, दोहा पारत अउ लाठी चलावत निकलथें, तब पूरा गाँव के वातावरण उत्साह ले भर जथे।
गड़वा बाजा के अलग-अलग धुन अउ परी मन के मस्त होके नचई सबके मन मोह लेथे। दइहान पहुँचके राउत मन सबले पहली नाचत-नाचत मड़ई के सात भाँवर घूमथें। फेर गाय मन ले गोवर्धन ला खुंदवाथें अउ जमके नाचथें। अपन लाठी के कला अउ ताकत के प्रदर्शन करथें। लाठी चलाय के कला, अखाड़ा के खेल अउ नाच-गान मड़ई के प्रमुख आकर्षण होथे।
जब दूसर गाँव के सगा राउत भाई मन के टोली मड़ई मा पहुँचथे, तब ओमन के स्वागत करे बर राउत मन के एक टोली आधा रद्दा तक नाचत-कूदत जाथे। फेर सबो झन लाठी चलावत, अखाड़ा खेलत, दोहा पारत अउ नाचत-कूदत ओमन ला दइहान तक लाथें। ए दृश्य देखे बर गाँव के लोगन मन के भीड़ लग जथे। सबके मन मा उत्साह अउ उमंग छाय रहिथे। गड़वा बाजा के गूँज, लाठी के खनक, दोहा के आवाज अउ नाचत राउत मन के टोली मड़ई मेला ला अउ भव्य बना देथे।
अइसने नाच-गान, पूजा-पाठ अउ आपसी मेल-मिलाप के बीच हमर मड़ई मेला के दिन बीतथे। रातभर चलइया ए आयोजन के उत्साह अउ उमंग भोर होवत-होवत शांत हो जथे। फेर मड़ई के याद मन मा बहुत दिन तक बसे रहिथे।
दूसर दिन राउत भइया मन गाजा-बाजा के संग अपन किसान भाई मन के घर जाथें, जोहार-भेंट करथें अउ सहयोग बर आभार प्रकट करथें। ए परंपरा हमर गाँव के आपसी संबंध, प्रेम अउ भाईचारा के सुंदर उदाहरण आय।
ए प्रकार ले हमर मड़ई मेला के आयोजन होथे। एकर भव्यता, उत्साह अउ लोकसंस्कृति के रंग के बखान करना आसान नइ हे। मड़ई मेला हमर छत्तीसगढ़ माटी के खुशबू अउ हमर चिन्हारी आय। ए केवल एकठन तिहार नइ, बल्कि हमर लोकजीवन, लोकआस्था, लोककला अउ सामाजिक एकता के प्रतीक आय।
फेर आज चिंता के बात ये हे कि हमर पारंपरिक मड़ई मेला धीरे-धीरे कम होवत जात हे। पहिली गाँव-गाँव मा मड़ई मेला के आयोजन होवत रहिस, फेर आज बहुत अकन गाँव मा ए परंपरा कमजोर पड़त दिखत हे। एकर कारण राउत समाज के उदासीनता आय कि आर्थिक मजबूरी, एखर ऊपर विचार करे के जरूरत हे। मड़ई मेला के आयोजन मा आर्थिक खरचा लगथे। गाजा-बाजा, परी मन के व्यवस्था, पूजा-पाठ अउ दूसर जरूरी काम बर पर्याप्त साधन के जरूरत पड़थे। ए स्थिति मा केवल राउत समाज के भरोसा ए परंपरा ला बचाय बर पर्याप्त नइ हो सकय।
हमर मड़ई मेला ला बचाय अउ आगे बढ़ाय बर समाज के संग शासन-प्रशासन के सहयोग घलाव जरूरी हे। शासन ला चाही कि गाँव के पंचायत मन ला पारंपरिक मड़ई मेला के आयोजन बर आवश्यक सहायता राशि देय जाय। संगेसंग स्थानीय समाज, युवा पीढ़ी अउ सांस्कृतिक संगठन मन ला घलाव एखर संरक्षण बर आगे आना चाही।
यदि हमन अपन पुरखा मन के ए अनमोल परंपरा ला सहेजे के प्रयास नइ करबो, त आने वाला पीढ़ी मन हमर ए सांस्कृतिक धरोहर ले दूर हो सकथें। मड़ई मेला के संरक्षण केवल एक तिहार के संरक्षण नइ, बल्कि हमर छत्तीसगढ़ी संस्कृति, लोकपरंपरा अउ सामाजिक एकता ला बचाय के काम आय।
हमर माटी के खुशबू, हमर लोकसंस्कृति के मान अउ हमर छत्तीसगढ़ के चिन्हारी—मड़ई मेला हर आय। आवा, हमन सबो झन मिलके ए अनमोल परंपरा ला सहेजबो अउ आने वाला पीढ़ी तक पहुँचाबो।
— हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
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